पद्म सम्मान से वंचित, मगर दिलों में अमर...कव्वाल हबीब पेंटर का जिंदगीनामा
vinod bharti
हबीब पेंटर...। यह नाम सुनते ही 'बहुत कठिन है डगर पनघट की' कव्वाली याद आना स्वभाविक है। पेंटर ने जो लिखा, वह करके भी दिखाया। कव्वाली से खूब कमाया और इसमें से साठ लाख समाज सेवा में लगा दिया। करीब पचास साल पहले इतनी राशि दान में देना बहुत कठिन डगर से गुजरना ही जैसा था। इसकी कई देशों में तारीफ हुई, लेकिन कव्वाली में हर समय खोए रहने वाले पेंटर ने कभी इस पर ध्यान नहीं दिया।
कई किस्से-कहानी बताते हुए उनके पौत्र कव्वाल गुलाम फरीद पेंटर ने एक ऐसा जिंदगीनामा याद किया, जिसमें समाज सेवा ही नहीं देशभक्ति भी शामिल है। पूरी दुनियां में उनकी पहचान हबीब पेंटर नाम से ही थी, लेकिन पूरा नाम हबीबुर्रहमान उर्फ हबीब पेंटर था। 19 मार्च 1920 को माणिक चौक में उनका जन्म हुआ। पिता मो. इब्राहिम खान काराबोरी थे। बचपन से ही शायरी का शौक था। बड़े हुए तो तमाम गजल, कव्वाली लोगों की जुबां पर आ गई। इन्हें गुनगुनाते हुए फरीद पुराने दिनों को भी याद करते हैं। इस दौरान बताया कि देश का विभाजन होने पर दादा (हबीब पेंटर) के छोटे भाई अब्दुल रहमान पाकिस्तान चले गए। हबीब पेंटर नहीं गए, कहा, मुझे ङ्क्षहदुस्तान से मोहब्बत है। यहां जन्म लिया है, यहीं की खाक में मिल जाऊंगा। एक समय हबीब पेंटर की शोहरत देश-दुनिया तक पहुंच गई। खूब पैसा कमाया, लेकिन जरूरतमंदों को दान कर दिया। बंगाल के बाढ़ पीडि़तों से लेकर स्कूल-कालेजों में गरीब बच्चों की मदद के लिए कार्यक्रम किए। अन्य संस्थाओं के बुलावे पर दर्जनों बार चैरिटी प्रोग्राम में गए। 1962 में भारत-चीन युद्ध के दौरान जनमानस को जगाने व सैनिकों का हौसला बढ़ाने का बीड़ा उठाया। जगह-जगह कार्यक्रम किए। उनसे जुटाई गई राशि सरकार को दान दी। करीब 60 लाख रुपये अपने जीवन में दान दिए, जो बहुत बड़ी राशि थी। खुद सादगी से जीवन जिया। 22 फरवरी 1987 को वे अलविदा कह गए।
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किशोरावस्था में ही बन गए कव्वाल
हबीब पेंटर किशोरावस्था में ही धार्मिक गुरु शाह नन्हें मियां के सानिध्य में आ गए। 1938 में पठान मोहल्ला में उर्स हुआ। शाह नन्हें मियां ने शहर के ही दूसरे हबीब कव्वाल को बुलाया, जो कहीं और चले गए। शाह काफी नाराज हुए। उन्होंने हबीब पेंटर से कुछ सुनाने के लिए कहा तो उन्होंने नात पढ़कर सबका दिल जीत लिया। अध्यात्मिक शायरी भी सुनाई। शाह काफी खुश हुए। तब शाह ने हुनर सीखने के लिए कव्वाल निजाम राही की उस्तादी में भेज दिया।
खूब कमाया नाम
हबीब पेंटर ने कव्वालियां ही नहीं, सूफियाना कलाम भी गाए। कृष्ण, सत्संग, मानवतावाद, सांप्रदायिक सौहार्द व आध्यात्मिक कलामों को सुर दिए। आकाशवाणी व दूरदर्शन पर अनेक प्रोग्राम किए, लेकिन फिल्मों में गाने से मना कर दिया। देश के तत्कालीन राजनेताओं से लेकर उद्योगपति तक उन्हें सम्मान देते थे। जम्मू कश्मीर के प्रधानमंत्री गुलाम बख्शी मोहम्मद ने उन्हें बुलबुुल-ए--ङ्क्षहद के खिताब से नवाजा। उनकी कव्वालियों को पसंद करने वालों में पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू, पूर्व राष्ट्रपति डा. सर्वपल्ली राधा कृष्णन भी शामिल थे।
पद्म सम्मान न मिलने का मलाल
गुलाम फरीद पेंटर ने कहा कि देश का ऐसा कोई कव्वाल न होगा, जो हबीब पेंटर से न सीखता हो। अफसोस, ऐसे फनकार को 'पदमश्रीÓ सम्मान तक न मिला। सिविल लाइन क्षेत्र में नगर निगम ने एक पार्क उनके नाम पर विकसित किया। परिवार अब उस्मानपाड़ा में रहता है। यहां की मुख्य सड़क हबीब रोड नाम से जानी जाती है।
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विनोद भारती
(सर्वाधिकार सुरक्षित)
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